आखिर सरकार की गलत नीतियों का विरोध करने वाला अपराधी कैसे हो जाता है?
कैसे एक आम नागरिक प्रजातंत्र मे सरकारी मशीनरी की भेट चढ़ जाता है?
कैसे आयी प्रजातंत्र मे हिटलरशाही?
अगर ईन सब के जवाब चाहिए तो अपने गिरेबां मे झांक के देखिए की कैसे हमने प्रजातंत्र मे जातिवाद को घुसेड के
नेताओ की राजनीति असान कर दी और अपने पैर पे कुल्हाड़ी मार ली
सरकार लगातार निजता का हनन कर रही है
कानून के रूप मे म्रत्यु के प्रमाण पत्र पे ठप्पा लगा रही है,कैसे असहाय बना दिया है मतदाता को,
मतदाता अगर किसी भी परेशानी का शिकार है तो वो उसकी गलत या ये कहे नीच सोच है और वो है जाति!
मुस्लिमों को हिन्दुओ से लडा के
उच्च जाति को दलितों से लड़ा के
दलितों को मुसलमानो का दुश्मन बना के
ईसाईयों को धर्म का खरीदार बता के
सिखों को खालिस्तानी बना के
मुस्लमान को पाकिस्तानी बता के
राजनीति करना आज के भारत का अभिशाप है,
और इसके जिम्मेदार सीधा सीधा भारत का मतदाता है??
मतदान से पहले एक प्रोपेगेंडा चलाया जाता है
की अगर फलां पार्टी अस्तित्व मे आती है तो
एक धर्म विशेष को देश से निकाल दिया जाएगा
और उनके घरों जमीनों पे विशेष धर्म वालों का कब्जा हो जाएगा,
पर किसी देश का मतदाता इतना भी बेवकूफ़ हो सकता है ये शायद ही किसी ने देखा हो??
जब उसको ये वाक्य कहे जा रहे थे
या उसके सामने sm के माध्यम से
ये प्रोपेगेंडा उसके सामने परोसा गया था
वो ये भूल गया था कि पृथ्वी पे भारत ही एक मात्र
लोकतांत्रिक देश नहीं?
और भी देश है जहां लोकतांत्र lockup मे बंद नहीं है
जहां कानून की आँखों पे पट्टी नहीं है
जहां कानून के देवी की
आंखे खुली है,जहां इस देश के जैसे बेवकूफ़ मतदाता नहीं है,
खैर ये तो पहली गलती हुई
दूसरी गलती तब होती है कि अगर एक बार किसी को बेवकूफ़ बना दिया जाए तो वो दुबारा बेवकूफ़ नहीं बनता पर हम ठहरे महान भारतवासी
ज़ज्बात तो खून मे बहता है हमारी बहु बेटियों को को छेड़ दे तो खून नहीं
खौलेगा पर मज़ाल है कोई हमारे नेता के खिलाफ बोल दे तो पूरा शहर का शहर जला देगे,
और वो नेता भी सोचता है इतना प्यार तो खुद की उसकी माँ बीवी या उसके अपने नहीं करते होगे?
भारत का मतदाता ये सोच नहीं पाता कि कैसे उस तक वो बाते पहुच जाती है जिसको उसने आज से पहले कभी नहीं सुना?
कैसे उसको वो दिखा दिया जाता है जो आज से पहले उसने कभी नहीं देखा??
वो ये सोचने मे असक्षम है कि जाति की धारणा मन मे रख के कभी कोई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं बन सकता कभी कोई अपना अहित सोच के तुम्हारा भला नहीं कर सकता,
तो फिर ये कैसे मान लिया कि जिसके बच्चे नहीं है वो भला क्या खाएगा
जिसके बीवी नहीं है वो भला किसके लिए कमाएगा जिसका परिवार नहीं है वो भला क्या जमा करेगा,??
इस तरह के बहुत से प्रोपेगेंडा आपके सामने चलाए जा चुके है पर आप उसपे गौर करने की बजाय अन्धाधुन्ध अपने आने वाली पीढ़ी के लिए कांटे बो रहे है आपकी इस सोच से किसी का भला नहीं होने वाला अपितु आपका ही नुकसान होने वाला है,
आपकी नस्ल को जातिवाद का आदि बनाया जा रहा है और ये जाति वादी नशा अफीम गांजा चरस इत्यादि से भी खतरनाक है और इसके भेट आगे चल के आपकी नस्ल होने वाली है,
क्यूँ की इसकी नीव आपने डाली है
हाँ आप आप आपने डाली है
मैं ये किसी एक धर्म सम्प्रदाय या जाति के लिए नहीं बोल रहा हूं,
ब्लकि भारत के हर कौम हर जाति हर सम्प्रदाय के लिए बोल रहा हूं,
और क्यूँ बोल रहा हूं
वो इस लिए कि आज Dalit live matter पे लिखने के लिए दलित अपने समाज को ललकार रहा है मुस्लमान मुस्लमान को ललकार रहा है कि वो अपने समाज के के ऊपर होने वाले ज़ुल्म पे बोल नहीं रहा है?
ज़ुल्म के खिलाफ बोलना गलत नहीं है
पर उस ज़ुल्म को जाति सम्प्रदाय मे प्रथक करना गलत है!
और संयोग देखिए कि ज़ुल्म के खिलाफ बोलते बोलते नई पार्टियां अस्तित्व मे आ जाती!
अभी हाल ही मे दलित शोषण के नाम पे एक नई पार्टी बनी है जिसकी धारणा है कि उनका समाज़ शोषित है और ज़ुल्म झेल रहा है, इसीलिए एक पार्टी बना ली अब वो पार्टी एक धर्म सम्प्रदाय के नाम पे रजिस्टर हो गई, Aimim मुस्लिमों के हित के लिए लड़ती दिख रही है
हर राज्य के चुनाव मे मुस्लिम हित सर्वोपरि रहता है
Dalit वोट बैंक भी नजर मे है,
पर समस्या यहां नहीं है कि पार्टी क्यूँ बनी??
समस्या ये है कि ये धार्मिक पार्टियां बनी क्यूँ??
बीजेपी हिन्दुत्व के नाम पे वोट मांगती है
पुरूषोत्तम राम को आगे करके राजनीति करती है
शिवसेना नाम से ही धार्मिक है
बीएसपी Dalit कार्ड खेल के राजनीति करती आई है
कॉंग्रेस सॉफ्ट हिन्दुत्व के नाम पे सत्ता का सुख भोग चुकी है
Owaisi कट्टर मुस्लिम छवि बना चुके है
ममता अखिलेश तेजस्वी खुद को Secular पार्टी के मसीहा साबित कर चुकेहै,और वो शायद इसलिए Secular रह गए कि शायद इनका दिल बड़ा है पर पता सब को है कि ईन सबका उद्देश्य सत्ता प्राप्ति है
पर मतदाता आज भी यही सोच रहा है कि ये सब हमारे हक केलिए लड़ रहे है

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