एक जमाने में भारत कृषि प्रधान देश था , लेकिन अब घोटाला प्रधान देश बन चुका है . आजाद भारत में पहला घोटाला ' जीप घोटाला ' माना जाता था . और जब ' घोटाला ' जीप पर सवार होकर देश में आया हो तो उसे दूर तलक चलना ही है . घोटाले की एक ऐसी समृद्ध परंपरा देश में विकसित हुई कि घोटालेबाजों ने हर उस चीज में घोटाला करके दिखा दिया , जिसे देख अंतरराष्ट्रीय घोटालेबाज शर्म से मर जाएं . सुई से लेकर हेलीकॉप्टर , आंख से लेकर किडनी , कफन से लेकर राशन तक हर चीज में यहां घोटाला होता है . जिस तरह किसानों की आत्महत्या , बलात्कार , राजनेताओं के आरोप और महंगाई जैसी खबरों को लेकर हिंदुस्तानी अभ्यस्त हो चुके हैं , हमने देखा है कैसे ईवीएम घोटाला हुआ कैसे नोटबंदी घोटाला हुआ, वैसे ही घोटालों से जुड़ी खबरों को लेकर हम ये सोच चुके हैं . हद ये कि हम लोग मानने लगे हैं कि ' बिन घोटाला सब सून ' , कोई बाबू घोटाले के आरोप में सस्पेंड हुए बिना रिटायर हो जाए तो लोग उसे न केवल निहायत गरीब व्यक्ति करार देते हैं , बल्कि मानते हैं कि उसे दुनियादारी की समझ नहीं थी . मंत्री बनकर नेता घोटाला न करे तो उसके रिश्तेदार नाराज हो जाते हैं .
घोटाले से कई लोगों के जीवन में बहार आती है . बहार आने से लोगों के चेहरे पर खुशी आती है . लोग खुश होते हैं तो राष्ट्र का ' हैप्पीनेस इंडेक्स ' ऊंचा होता है , जिस तरह फुटबॉल के खेल में 11 खिलाड़ी साथ मिलकर विरोधी को रौंदते हैं , वैसे ही बड़ा घोटाला करने के लिए कई घोटालेबाजों को जाति - धर्म विचारधारा वगैरह के पचड़े से निकलकर एक तय उद्देश्य को पाने में जी - जान से जुटना पड़ता है . इस लिहाज से घोटाला लोगों को आपस में जोड़ने वाला ' खेल ' भी है . किंतु मैं कई दिन से इसलिए ET परेशान था क्योंकि घोटालों की ग समृद्ध परंपरा में नए आयाम नहीं जुड़ । रहे थे . ऐसा प्रतीत होने लगा था कि 7 घोटालेबाजों के दिमाग में भी जंग लग गई है . जिस तरह 80 के दशक . में 90 फीसदी हिंदी फिल्मों की कहानी एक सरीखी होती थी , वही हाल घोटाले के क्षेत्र में हुआ था . वही तरीका , वही चीजें . किडनी घोटाला पंजाब में हो रहा है तो नगालैंड में भी . राशन घोटाला महाराष्ट्र में हो रहा है तो मणिपुर में भी .
अरसे बाद एक नया घोटाला मैदान में आया है टीआरपी घोटाला . जिन लोगों को नहीं मालूम कि टीआरपी क्या बला है , उनके लिए बता दूं कि जब किसी न्यूज चैनल की टीआरपी आती है तो कहीं मातम मने , चैनल के दफ्तर में खुशियां मनती हैं . टीआरपी नहीं आती तो सारे जहां में घी के दीए जलें , चैनल के दफ्तर में मातम पसरा रहता है . टीआरपी दर्शकों के टेलीविजन देखने का पैमाना है . जिस तरह ट्रम्प की जुबान पर कोई लगाम नहीं लगा सकता , वैसे ही माना जाता था कि टीआरपी को कोई चैनल अपने हिसाब से नियंत्रित नहीं कर सकता . लेकिन घोटालेबाजों ने ऐसा करके दिखा दिया . उन्हें नमन !!
नोट : यह लेखक के अपने विचार हैं

सब चंगा सी
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