लगातार गिरते देश की अर्थव्यवस्था की चिंता न ही मंत्रियों को है न मीडिया को : प्रोफ़ेसर शाद

Share:

prof. Shad

विकास की आस दे कर और बड़े बड़े खोखले वादों से इलेक्शन में लोगो का दिल जीत कर इलेक्शन भी जीत गए पर जैसे जैसे दिन गुजरते गए वैसे वैसे विकास की आस भी धुंधली होती गई और विकास विनाश की ओर तब्दील होता चला गया दौर-वक़्त के हुक्मरान अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए क्या विकास क्या वादा सब भूल गए दिन गुजरता चला गया और वादे अब धार्मिक भावना पर तब्दील होता चला गया। बात थी स्मार्ट सिटी बनाने की शौचालय में अटक गई वादा था यूनिवर्सिटी स्कूल कालेज का मंदिर में भुला दिया न ही अस्पताल न ही सड़क न ही रोजगार सब के सब वादें खोखली और जनता मासूमियत से सब स्वीकार करती गई देश की अर्थव्यवस्था चौपट कर्ज़ पर कर्ज आखिर कब?

देश को उन्नति विकास की ओर ले जाने की बात थी पर देश को विकासशील के सूची से भी बाहर कर दिया अगर देश को बचाना है जम्हूरियत को बचाना है तो आवाज उठाना होगा क्योंकि सवाल है अधिकारों का सवाल है भविष्य का सवाल है देश की आर्थिक स्थिति का। जय हिंद जय भारत

नोट : यह लेखक के अपने विचार हैं

No comments