संघ के अतीत पर बात होती है तो ओवैसी की भी कुंडली खुलनी चाहिए : इलियास

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सितंबर, 1948. भारत आजाद हो चुका था. हैदराबाद का निजाम उस्मान अली खान आसफजाह स्वतंत्र देश चाहता था. उसे माउंटबेटन समेत किसी का समर्थन नहीं था. लेकिन वह अपनी मांग पर अड़ा हुआ था. नेहरू बातचीत से रास्ता निकालना चाहते थे, लेकिन निजाम मानने को तैयार नहीं था. 

निजाम ने अपनी अलग सेना बना रखी थी जिन्हें रजाकार कहते थे. रजाकारों में सिर्फ ​मुस्लिम समुदाय के लोग थे. वह भारत की सेना, करंसी यहां तक कि भारत की संप्रभुता को मानने से इनकार कर रहा था. हैदराबाद रियासत में ज्यादा आबादी हिंदुओं की थी. राज मुस्लिमों का था. अत्याचार चरम पर था. हैदराबाद का निजाम दुनिया के सबसे धनी रजवाड़ों में से एक था. 

यह निजाम भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान को मदद के तौर पर करोड़ों रुपये दे चुका था. वह भारतीय संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा था. वह माउंटबेटन की अगुआई में हुए एग्रीमेंट को भी तोड़ रहा था. 

उसी दौरान हैदराबाद में मुसलमानों का एक ग्रुप बना MIM. इसके मुखिया थे नवाब बहादुर यार जंग. इनकी मौत के बाद मुखिया बने कासिम रिजवी, जो रजाकारों के नेता थे. एक तरह से इस्लामिक सेना थी. ये लोग डेमोक्रेसी में यकीन नहीं करते थे और इस्लामिक राज्य बनाना चाहते थे. इनकी मांग थी कि पूर्वी पाकिस्तान की तरह हैदराबाद को दक्षिणी पाकिस्तान बनाया जाए या फिर अलग देश बनाया जाए. 

निजाम और भारत सरकार की उठापटक के बीच इस ग्रुप ने आतंक फैलाना शुरू किया. इनका मुख्य निशाना थे हिंदू, लेकिन जो भी इनके खिलाफ गया, उसी पर इन्होंने कहर बरपाया. कम्युनिस्ट और मुसलमानों को भी मारा गया. हैदराबाद में हत्या, लूट और बलात्कार का खूनी खेल खेला जाने लगा. 

नेहरू की बातचीत की कोशिशें सफल नहीं हो रही थीं. हालत इतनी बिगड़ गई कि गृहमंत्री सरदार पटेल का धैर्य टूट गया. बिना दुनिया को भनक लगे हैदराबाद को सेना ने घेर लिया. पांच दिन चले संघर्ष में रजाकारों को बर्बाद कर दिया गया. निजाम अपने कुत्ते के साथ लंदन भाग गया. कहते हैं इस लड़ाई में तकरीबन 40 हजार लोग मारे गए थे. 

MIM को कुचल दिया गया. इसके दफ्तर को फायर स्टेशन बना दिया गया. पार्टी को बैन कर दिया गया. कासिम रिजवी को पकड़कर जेल में डाल दिया गया और नेहरू सरकार ने उसे 9 साल जेल में रखा. 1957 में कासिम को इस शर्त पर रिहा किया गया कि वह पाकिस्तान चला जाएगा. उसे पाकिस्तान जाने के लिए दो दिन का वक्त दिया गया. 

बाहर निकल कर उसने अपनी पार्टी की मीटिंग की. अब सवाल था कि पार्टी कौन संभालेगा. इसी ग्रुप के एक सदस्य थे अब्दुल वाहिद ओवैसी. अब्दुल वाहिद ओवैसी वकील भी थे. इन्होंने पार्टी की जिम्मेदारी संभाली और नाम रखा गया ऑल इंडिया मजलिए-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन यानी AIMIM. 

अब्दुल वाहिद ओवैसी के बाद उनके बेटे सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने 1975 में पार्टी संभाली. अब उनके बेटे असदुद्दीन ओवैसी इस पार्टी के नेता हैं. ओवैसी बैरिस्टर बनकर तकरीर करते हैं और जहर उगलने के लिए अपनी पार्टी के चंपुओं को लगाते हैं. 

इसमें क्या हैरानी है कि वे गाहे-ब-गाहे जहर उगलते हैं. ये जबरन मुसलमानों के रहनुमा बन रहे हैं लेकिन रह-रहकर अंदर का पुराना जहर बाहर छलक जाता है. जिन मुसलमानों ने हिंदुस्तान को अपना वतन चुना था, उनके सामने मौलाना आजाद और गांधी जैसे नेताओं का भरोसा था. हिंदुस्तानी मुसलमानों को ओवैसी मार्का जहर की कोई जरूरत नहीं है. हिंदुस्तान की आंखों में आज भी भगत सिंह और अशफाक उल्लाह खान का चेहरा ताजा है.  

कृष्णकांत भाई की वाल से

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