बस इत्ती सी घोषणा से ओवैसी के फेसबुकिया समर्थक उछलने लगे।
मुसलमान दरअसल राजनैतिक रूप से छिछली कौम है , ज़रा सी बात पर उछलने लगती है। उसमें धार्मिक गंभीरता तो बहुत है पर राजनैतिक बचपना भी बहुत है। ज़रा सी बात पर गंभीरता से सोचने की जगह सीना अकड़ कर वर्ताव करने लगते हैं।
यही कारण है कि वह राजनीति में कुछ ना कर सके , एक सांसद का टिकट मिल जाए तो गवर्नर समझने लगते हैं , बजाए कि गंभीरता से सोचने और प्लान करने की जगह अपने ही समाज के दूसरे लोगों पर धौंस जमाने लगते हैं।
खैर , ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM ) कहीं से चुनाव लड़े यह उनका हक है , किसी को आपत्ती नहीं करनी चाहिए। हर राजनैतिक दल की तरह उसको भी अपनी उम्मीदवारी जनता के सामने रखने का अधिकार है।
पर तर्क और तथ्य यह है कि जिस जगह जिस राज्य में जहाँ उसका जन्म है , जहाँ उसका गढ़ है वहाँ वह कभी आठवीं सीट पर चुनाव नहीं लड़ी तो बिहार की 32 सीट पर चुनाव लड़ने का मतलब समझा जा सकता है।
अच्छा ~
— Kashif Jamil (@Nagrik18) June 12, 2020
बिहार में नीतीश की नैया डोल रही है।
BJP का वोट बढ़ा है "मुस्लिम-फोबिया" से महागठबंधन मुस्लिम वोट की और ताक रहा है BJP को रोकने के लिए..
32 सीटों पे मुस्लिम 22 से 37% है।
( Cencus-11 )
10% वोट भी खिसका तो BJP की "जीत निश्चित" है
बाक़ी, मुस्लमान तो "ग़द्दार" है ही
🤙🙏
अब आप पूछिएगा कि आठवीं सीट पर चुनाव क्युँ नहीं लड़ी ? मुसलमानों के वोटों का बिखराव ना हो और टीआरएस का नुकसान ना हो जाए। केसीआर की टीआरएस जिन्होंने तमाम मुस्लिम विरोधी बिल पर मोदी सरकार को संसद में समर्थन दिया है।
ओवैसी को अपने वित्तीय साम्राज्य को बचाने और बढ़ाने के लिए खुद अपने राज्य में तो अपनी शुभचिंतक केसीआर की गैर भाजपाई सरकार चाहिए पर दूसरी जगहों पर उनको इससे परवाह नहीं कि मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ तो फायदे में कौन होगा।
बाकी राज्यों मे योगी आए या कोई आए उनको इससे मतलब नहीं , इस बात के लिए उनके पास बहुत से तर्क हैं जो सवाल करने वालों को चुप करा देते हैं। पर इसका जवाब नहीं देते कि तेलंगाना की आठवीं सीट पर क्युँ नहीं लड़ते।
वैसे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM ) के चुनाव लड़ने से मुझे कोई व्यक्तिगत समस्या नही है।
हम योगीराज में मस्त हैं।

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